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Navratri-Durga Puja | नवरात्रि-दुर्गापूजा

नवरात्रि और दुर्गापूजा (Navratri and Durga Puja) का पर्व भारत में दो बार मनाया जाता है। शक्ति की आराधना का सर्वाधिक प्रचलन पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, असम, उड़ीसा, बिहार, उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हिमाचल, राजस्थान, मध्यभारत में है। दुर्गा के सभी शक्ति पीठों में भव्य आयोजन होते हैं।

नवरात्र शक्ति की अधिष्ठात्री दुर्गा देवी के नव स्वरूपों की पूजा के नव दिनों अर्थात् नवरात्रियों के समूह को कहते हैं। दुर्गा के स्वरूपों का परिचय इस प्रकार है- (1) शैलपुत्री, (2) ब्रह्मचारिणी, (3) चन्द्रघण्टा, (4) कूष्माण्डा, (5) स्कन्दमाता (6) कात्यायिनी, (7) कालरात्रि, (8) महागौरी, तथा (9) सिद्धिदात्री इन्हीं नवों स्वरूपों की अर्चापूजा के लिए इन नवरात्रियों की कल्पना की गई है।

ऋग्वेद के ‘रात्रि सूक्त’ से रात्रि के महत्त्व का पता लगता है और उसी का एक दूसरा प्रसंग ‘देवी सूक्त’ के नाम से भी विख्यात है, फलतः शक्ति की अधिष्ठात्री देवी के अर्चन-पूजन एवं भजन के लिए इन रात्रियों का महत्त्व हमारे देश में परम प्राचीन काल से ही प्रचलित है।

नवरात्र का महत्त्व हमारे देश के ग्रामों में नगरों की अपेक्षा अधिक है। वहाँ नवरात्र के नव दिन लोग परम पवित्रता एवं पूज्य भावना से ओत-प्रोत रहते हैं। नवरात्र में शीतल मन्द सुगन्ध पवन बहने लगता है, वृक्ष एवं लता-बल्लरियों में पुष्पों एवं मंजरियों की आभा देखने योग्य हो जाती है। न अधिक ठण्डक होती है, न अधिक गर्मी। रात्रि की मनोहरता तो दोनों नवरात्रों में अत्यधिक बढ़ जाती है। श्रद्धालुओं सर्वत्र आदिशक्ति की अपार माया का प्रसार दिखाई पड़ता है। इस प्रकार अभावों से मुक्त मानव मन को आध्यात्मिक प्रेरणा देने की शक्ति नवरात्र के समान किसी अन्य पर्व में नहीं है। इन नवदिनों में दुर्गा-स्तोत्र के पवित्र ग्रन्थ ‘दुर्गा सप्तशती’ का पाठ बड़ी भक्ति एवं निष्ठा से किया जाता है। दुर्गा सप्तशती’ की मनोहर एवं रोमांचकारी कथाऐं हिन्दू परिवारों में परम प्राचीन काल से प्रसिद्ध हैं। चैत्र नवरात्र में दुर्गा सप्तशती और रामचरितमानस के पाठ का विशेष महत्त्व है। सदगृहस्थ घरों में तो चैत्र और शारदीय नवरात्र में दुर्गा सप्तशती का पारायण होता है। समापन हवन के आयोजन और पूर्णाहुति से मध्यरात्रि के बाद किया जाता है। दुर्गासप्तशती में शक्ति की प्रतिष्ठा और आराधना का सुन्दर संयोजन है। नारी की शक्ति, गरिमा और सर्वोच्चता का प्रतीक है यह पर्व दुर्गा सप्तशती में दुर्गा के तीन चरित्र वर्णित है। प्रथम चरित्र, मध्य चरित्र और उत्तर चरित्र ।

त्रिगुणात्मिका शक्ति के प्रतीक के रूप में सत्वगुणात्मिका शक्ति को महा सरस्वती, रजोगुणात्मिका शक्ति को महालक्ष्मी तथा तमोगुणात्मिका शक्ति को महाकाली की संज्ञा दी गई है। इन तीनों में से महाकाली के चरित्र को प्रथम, महालक्ष्मी के चरित्र को मध्यम तथा महासरस्वती के चरित्र को उत्तर चरित्र की संज्ञा दी गई है। पुराणों में साधारणतया ब्रह्मा सरस्वती से, विष्णु महालक्ष्मी से तथा शंकर अथवा रुद्र पार्वती अथवा दुर्गा से सम्बन्धित देवता के रूप में वर्णित हैं, किन्तु तीनों चरित्रों में ब्रह्मा प्रथम चरित्र अर्थात् महाकाली के, विष्णु मध्यम चरित्र अर्थात् महालक्ष्मी के तथा रुद्र उत्तर चरित्र अर्थात् महासरस्वती के मन्त्रो के ऋषि (मन्त्रद्रष्टा) बताए गए हैं और अग्नि, वायु तथा सूर्य इनके तत्त्व एवं ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद इनकी ध्यान पद्धति के स्वरूप हैं।

आदिशक्ति दुर्गा के तीनों पवित्र चरित्रों की कल्पना बड़ी ही मनोरंजक है। प्रथम चरित्र की कथा कल्पान्तर की है, जबकि सम्पूर्ण जगत् एक महासमुद्र के रूप में बदल गया था और समस्त चराचर जीव उसमें विलीन हो गए थे। सृष्टि के पालक भगवान् विष्णु शैष शैय्या पर योगनिद्रा में थे। उस समय उनके कानों की मेल से दो भयंकर असुर मधु और कैटभ नाम से उत्पन्न हुए और वे उत्पन्न होते ही ब्रह्मा को मारने के लिए दौड़ पड़े। ब्रह्मा अकेले थे। असुरों की इस विकराल चेष्टा से भयभीत होकर वे भगवान् विष्णु को जगाने के लिए उनके नेत्रों में निवास करनेवाली योगनिद्रा की विनीत भाव से स्तुति करने लगे। स्तुति के अनन्तर भगवान् विष्णु के नेत्र, मुख, नासिका, बाहु, हृदय तथा वक्षःस्थल से शक्ति का प्रादुर्भाव हुआ और वह तुरन्त ही जाग पड़े। जागने पर उन्होंने उन दोनों महान् भयंकर असुरों को देखा, जो चतुरानन को उदरस्थ करने की चिन्ता में विद्दल हो रहे थे। फिर तो भगवान् विष्णु के साथ उन दोनों भयंकर असुरों का भीषण संग्राम आरम्भ हो गया, जो पाँच हजार वर्ष तक चलता रहा। उन दोनों असुरों का विनाश आदि शक्ति ने ही किया।

मध्यम चरित्र की कथा में महिषासुर के विनाश का रोमांचकारी वर्णन है। महिषासुर सूर्य, चन्द्रमा, इन्द्र, अग्नि, वायु, यम, वरुण तथा अन्यान्य देवताओं के अधिकारों का स्वयं उपभोग करने लगा था और इन सबको उसने अपदस्थ कर दिया था। स्वर्ग पर उसी का अधिकार था और देवता लोग अमरावती से बहिष्कृत कर दिए गए थे। पराजित देवताओं ने ब्रह्मा को आगे कर विष्णु और शंकर से प्रार्थना की कि उस दुर्दान्त असुर से हमारी ही नहीं, त्रैलोक्य की रक्षा की जाए। महिषासुर के अन्याय की कहानी सुनकर विष्णु और शिव की भ तन गई और मुँह टेढ़ा हो गया और उनके मुख से एक अलोकिक तेज की उत्पत्ति हुई। और इसी प्रकार वहाँ उपस्थित ब्रह्मादि देवताओं के शरीर से भी अपूर्व तेज निकला वह तेज एकसाथ मिलकर एक जाज्वल्यमान पर्वत के समान भयंकर दिखाई पड़ा और थोड़ी ही देर में एक दिव्य नारी के रूप में परिणत हो गया। देवताओं के पृथक्-पृथक् तेज के अंशों से उस अलौकिक एवं दिव्य नारी के अंगों की रचना हुई, और उसे इस रूप में प्रकट देखकर देवताओं को परम प्रसन्नता हुई। फिर तो सबने अपने अपने उत्तम शस्त्रास्त्रों से उस देवी को सुसज्जित किया और महिषासुर के विनाश की प्रार्थना की। देवताओं की करुण-प्रार्थना से द्रवित दुर्गा ने अपनी सना सहित महिषासुर का विनाश कर स्वर्ग को ही नहीं, त्रैलोक्य की भी निष्कण्टक बना दिया। देवताओं ने गद्गद कण्ठ से दुर्गा की प्रार्थना की और यह वरदान प्राप्त किया कि जब जब तुम लोग हमारा स्मरण करोगे, तब-तब में प्रकट होकर तुम्हारे संकटों को दूर करूंगी। यह वरदान देने के अनन्तर दुर्गा वहीं अन्तर्धान हो गई और त्रैलोक्य में उनकी यश पताका फहराने लगी।

देवी का उत्तर चरित्र आततायी दैत्यपति शुम्भ एवं निशुम्भ के सेना समेत विनाश की रौद्र-कथा है। ये दोनों भाई महान् पराक्रमी तथा दुर्धर्ष असुर शचीपति इन्द्र के हाथ से इन्होंने तीनों लोकों को छीन लिया था और देवताओं को यज्ञ-योगादि में जो भाग मिलता था, उससे भी वंचित कर दिया था। वे दोनों स्वयमेव देवताओं के भागों का उपभोग करते थे। सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, वायु, कुबेर यम और वरुण के अधिकारों को भी उन्होंने अपने अधीन कर लिया था। इस प्रकार अपमानित और पराजित देवताओं ने अपराजिता दुर्गादिवी का स्मरण किया।

हिमवान् की मनोहर उपत्यका में स्नान के लिए उद्यत पार्वती ने जब देखा कि समस्त देवगण किसी की प्रार्थना में निरत हैं, तो उन्हें यह जिज्ञासा हुई कि देवगण किस की प्रार्थना कर रहे हैं। वह यह पूछ ही रही थी कि उन्हीं के शरीर कोश से एक दूसरी देवी अम्बिका का आविर्भाव हुआ। अम्बिका ने अवतरित होते ही कहा- ‘दैत्यों से प्रताड़ित और अपमानित ये देवगण मेरी ही प्रार्थना कर रहे हैं। में उन सबका समूल विनाश करूंगी।’ दुःखी एवं हताश देवता, देवी की इस अमृतोपम वाणी से मारे प्रसन्नता के गद्गद हो उठे। फिर तो अम्बिका ने बड़ी रणचातुरी, कूट-बुद्धि एवं संगठन शक्ति से सदल बल शुम्भ निशुम्भ का रोमांचकारी विनाश किया। यही नहीं, उनके धूम्रलोचन, चण्ड-मुण्ड तथा रक्तबीज प्रभृति प्रचण्ड पराक्रमी सेनापतियों का भी विनाश किया। उत्तर चरित्र की यह कथा पढ़ते और सुनते हुए स्तम्भित रह जाना पड़ता है।

आदिशक्ति भगवती दुर्गा के इन्हीं तीनों पवित्र चरित्रों की पुण्य गाधा ‘दुर्गा सप्तशती’ नामक ग्रन्थ में कुल मिलाकर लगभग सात सौ श्लोकों के काव्य में वर्णित है। नवमी को दुर्गासप्तशती पाठ की पूर्णाहूति होती है।

विशेष विवरण शारदीय नवरात्रि शीर्षक लेख में दिया गया है। इस पर्व पर अखण्ड रामायण पाठ अथवा सुन्दर काण्ड के प्रतिदिन पाठ का विधान भी है।

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