भारतीय राष्ट्रध्वज (तिरंगे) का इतिहास : National Flag of India

किसी भी देश के स्‍वतंत्र होने का संकेत उसका राष्‍ट्र ध्‍वज या झंडा होता है। भारत का राष्ट्रीय ध्वज ( तिरंगा ) तीन रंगों की सामान चौड़ाई की क्षैतिज पट्टियों से बना ध्वज है जिसके बीचोबीच नीले रंग का एक चक्र होता है

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किसी भी देश के स्‍वतंत्र होने का संकेत उसका राष्‍ट्र ध्‍वज या झंडा होता है। भारत का राष्ट्रीय ध्वज (तिरंगा) तीन रंगों (केसरिया, सफ़ेद और हरा ) की सामान चौड़ाई की क्षैतिज पट्टियों से बना ध्वज है जिसके बीचोबीच नीले रंग का एक चक्र होता है । ध्वज की लम्बाई एवं चौड़ाई का अनुपात 3:2 है। ध्वज में सबसे उपर केसरी रंग ताकत और साहस का सूचक है, ध्वज के मध्य में गहरे नीले रंग के चक्र के साथ सफ़ेद पट्टी धर्म, सत्य और शांति को दर्शाती है और सबसे नीचे गहरा हरा रंग शुभता, विकास और उर्वरता का परिचायक है | ध्वज के मध्य में नीले रंग के चक्र में 24 तीलियाँ होती हैं जो 24 घंटे निरन्त भारत के प्रगतिशील होने का द्योतक है | भारत में “तिरंगे” का अर्थ भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज है। राष्ट्रीय झंडा निर्दिष्टीकरण के अनुसार झंडा हस्त निर्मित खादी से ही बनना चाहिए।। भारतीय ध्वज संहिता में इसके प्रदर्शन और प्रयोग के बारे में विस्तार से बताया गया है ।

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महात्मा गाँधी ने आजादी के आन्दोलन को एक ध्वज के नीचे लाने के लिए 1921 में सबसे पहले कांग्रेस के अपने झंडे के बारे में बात की थी जिसके कारण लाल और हरे रंग की दो पट्टियों वाले झंडे को पिंगली वेंकैया ने डिजाइन किया था | लाल रंग हिन्दु और हरा रंग मुसलमानों के प्रतीक के रूप में लाया गया था, लेकिन बाद में लाला हंसराज के सुझाव पर झंडे में सफेद रंग और चरखा भी जोड़ दिया गया | सफेद रंग से सर्वधर्म समानता का भाव और चरखे से ध्वज के स्वदेशी होने की झलक भी मिलने लगी | झंडे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाने के लिए डॉ. राजेंद्र प्रसाद के नेतृत्व में एक कमेटी का गठन किया गया | 22 जुलाई 1947 को आयोजित भारतीय संविधान सभा की बैठक के दौरान इस झंडे के बीच में चरखे को हटा कर वहां अशोक चक्र को सुशोभित करने के बाद इस तिरंगे झंडे को स्वतंत्र भारत के ध्वज के रूप में मान्यता प्रदान कर दी गई |

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“सभी राष्‍ट्रों के लिए एक ध्‍वज होना अनिवार्य है। लाखों लोगों ने इस पर अपनी जान न्‍यौछावर की है। यह एक प्रकार की पूजा है, जिसे नष्‍ट करना पाप होगा। ध्‍वज एक आदर्श का प्रतिनिधित्‍व करता है। यूनियन जैक अंग्रेजों के मन में भावनाएं जगाता है जिसकी शक्ति को मापना कठिन है। अमेरिकी नागरिकों के लिए ध्‍वज पर बने सितारे और पट्टियों का अर्थ उनकी दुनिया है। इस्‍लाम धर्म में सितारे और अर्ध चन्‍द्र का होना सर्वोत्तम वीरता का आहवान करता है।”

“हमारे लिए यह अनिवार्य होगा कि हम भारतीय मुस्लिम, ईसाई, ज्‍यूस, पारसी और अन्‍य सभी, जिनके लिए भारत एक घर है, एक ही ध्‍वज को मान्‍यता दें और इसके लिए मर मिटें।”

~ महात्‍मा गांधी

1951 में भारतीय मानक ब्यूरो (Bureau of Indian Standards) द्वारा पहली बार राष्ट्रध्वज के लिए कुछ नियम तय किए गये और 1968 में तिरंगे के निर्माण के सम्बन्ध में कुछ मानक तय किये गये | तिरंगे के निर्माण के लिए खादी के कपड़े का इस्तेमाल किया जाता है | धारवाण के निकट गदग और कर्नाटक के बागलकोट में खादी की बुनाई की जाती है और हुबली एक मात्र लाइसेंस प्राप्त संस्थान है जहाँ भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा कड़े गुणवत्ता परीक्षण के बाद ही झंडा उत्पादन व आपूर्ति की जाती है | बी॰आई॰एस॰ द्वारा झंडे की जाँच के बाद ही इसे फहराया जा सकता है |

26 जनवरी 2002 को भारतीय राष्ट्रध्वज संहिता में संशोधन किया गया। राष्ट्रध्वज संहिता से आशय भारतीय ध्वज (तिरंगे) को फहराने तथा प्रयोग को लेकर बताए गए निर्देश से है। इस संशोधन में आम जनता को अपने घरों तथा कार्यालयों में साल के किसी दिन भी ध्वज को फहराने की अनुमति दी गई पर साथ में, ध्वज के सम्मान में कोई कमी न आये इस बात का भी ख़ास खयाल रखने का निर्देश दिया गया।

क्‍या करें :

  • राष्‍ट्रीय ध्‍वज को शैक्षिक संस्‍थानों (विद्यालयों, महाविद्यालयों, खेल परिसरों, स्‍काउट शिविरों आदि) में ध्‍वज को सम्‍मान देने की प्रेरणा देने के लिए फहराया जा सकता है। विद्यालयों में ध्‍वज आरोहण में निष्‍ठा की एक शपथ शामिल की गई है।
  • किसी सार्वजनिक, निजी संगठन या एक शैक्षिक संस्‍थान के सदस्‍य द्वारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज का अरोहण/प्रदर्शन सभी दिनों और अवसरों, आयोजनों पर अन्‍यथा राष्‍ट्रीय ध्‍वज के मान सम्‍मान और प्रतिष्‍ठा के अनुरूप अवसरों पर किया जा सकता है।
  • नई संहिता की धारा 2 में सभी निजी नागरिकों अपने परिसरों में ध्‍वज फहराने का अधिकार देना स्‍वीकार किया गया है।

क्‍या न करें:

  • इस ध्‍वज को सांप्रदायिक लाभ, पर्दें या वस्‍त्रों के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता है। जहां तक संभव हो इसे मौसम से प्रभावित हुए बिना सूर्योदय से सूर्यास्‍त तक फहराया जाना चाहिए।
  • इस ध्‍वज को आशय पूर्वक भूमि, फर्श या पानी से स्‍पर्श नहीं कराया जाना चाहिए। इसे वाहनों के हुड, ऊपर और बगल या पीछे, रेलों, नावों या वायुयान पर लपेटा नहीं जा सकता।
  • किसी अन्‍य ध्‍वज या ध्‍वज पट्ट को हमारे ध्‍वज से ऊंचे स्‍थान पर लगाया नहीं जा सकता है। तिरंगे ध्‍वज को वंदनवार, ध्‍वज पट्ट या गुलाब के समान संरचना बनाकर उपयोग नहीं किया जा सकता।

तिरंगे के बारे में कुछ रोचक तथ्य :

  • राष्ट्रध्वज को लहराने का समय दिन में, सूर्योदय के बाद तथा सूर्यास्थ से पहले का है।
  • भारतीय राष्ट्रध्वज संहिता (Flag Code of India) में ध्वज से संबंधित कानून का विवरण किया गया है।
  • तिरंगे झंडे पर किसी भी प्रकार की आकृति का बनाना या लिखना दंडनीय अपराध है।
  • राष्ट्रध्वज निर्माण के लिए विषेश प्रकार से हाथ से काते गए खादी के वस्त्र का प्रयोग किया जाता है।
  • राष्ट्रध्वज के समीप किसी अन्य ध्वज को राष्ट्रध्वज के बराबरी में या उससे ऊँचा नहीं फहराया जा सकता।
  • किसी राष्ट्रविभुति के निधन पर राष्ट्र शोक में कुछ समय के लिए तिरंगे को झुका दिया जाता है।
  • देश का संसद भवन एक मात्र ऐसा स्थान है जहां एक साथ तीन तिरंगे लहराये जाते है।
  • राष्ट्रपति भवन के संग्रालय में एक लघु तिरंगा रखा गया है, जिसका स्तम्भ सोने से निर्मित है तथा अन्य स्थान पर हीरे जवाहरात लगे हैं।
  • देश का सबसे ऊँचा झण्डा भारत पाकिस्तान के अटारी बोर्डर पर 360 फीट की ऊचाई पर लहराया गया है।
  • 21 X 14 फीट के झण्डे पूरे देश के केवल तीन किले पर फ़हराये जाते है, कार्नाटक का नारगुंड किला, मध्यप्रदेश के ग्वालियर में स्थित किला तथा महाराष्ट्र का पनहाल किला।
  • सर्वप्रथम 7 अगस्त, 1906 को कोलकाता के पारसी बागान चौराहे पर हरा, पीला और लाल रंगों की आड़ी पट्टियों वाले तिरंगे ध्वज को राष्ट्र ध्वज के रूप में फहराया गया ।
  • 22 अगस्त, 1907 को जर्मनी के शहर स्टुटगार्ट में इण्टरनेशनल सोशलिस्ट काँग्रेस के सम्मेलन में मैडम कामा ने इसी ध्वज का कुछ परिवर्तित रूप फहराया।
  • आजादी के बाद देश के बाहर विदेशी जमीन पर पहली बार ऑस्ट्रेलिया में आधिकारिक रूप से तिरंगे झण्डे को फहराया गया।
  • 29 मई, 1953 को पहली बार तिरंगा माउण्ट एवरेस्ट पर तेनसिंह नार्गे एवं सर एडमण्ड हिलेरी द्वारा फहराया गया ।
  • 1971 में अमेरिका के अपोलो-15 नामक अन्तरिक्ष यान द्वारा भारत का राष्ट्रीय झण्डा सबसे पहले अन्तरिक्ष में फहराया गया।
  • 9 जनवरी, 1987 को कर्नल जे. के. बजाज ने दक्षिणी ध्रुव पर तिरंगे को पहली बार फहराया था।
  • 21 अप्रैल, 1996 को उत्तरी धुव पर स्क्वाडून लीडर संजय थापर ने तिरंगे को फहराया।
  • 5 अप्रैल, 1984 को भारत के प्रथम अन्तरिक्ष यात्री स्क्वाड्रन लीडर राकेश शर्मा तिरंगे को स्पेस सूट पर बैज के रूप में लगाकर अन्तरिक्ष में पहुँचे।
  • 26 जनवरी, 2002 को ‘ध्वज संहिता भारत’ का स्थान भारतीय ध्वज संहिता, 2002 ने ले लिया है। इसकी व्यवस्था के अनुसार अब आम नागरिक अपनी निजी संस्थाओं शिक्षण संस्थाओं में सम्मानित तरीके से साल के किसी भी दिन ध्वजारोहण कर सकते हैं।
  • 15 नवम्बर, 2008 को भारत ने चाँद पर भी अपना राष्ट्रीय ध्वज फहराया । इस प्रकार चाँद पर ध्वज फहराने वाला भारत विश्व का चौथा देश बन गया है। इससे पूर्व अमेरिका, रूस तथा यूरोपीय अन्तरिक्ष एजेन्सी ने भी अपने ध्वज वहाँ फहराये हैं।
  • देश के लिए जान देने वाले महान पुरूषों के शव को तिरंगे में लपेटा जाता है जिसमें केसरिया सिर के ओर तथा हरा पैर के ओर रखा जाता है।
  • वीरों की शव पर लपेटे गए तिरंगे को पुनः लहराया नहीं जा सकता, उसे जला दिया जाता है या पत्थर से बांध कर जल में डाल दिया जाता है।

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