Gandhi – Lawyer, Politician, Social Worker, Writer and a Mahatma

एक सामान्य परिवार में जन्मे और अपने असाधारण कार्यों एवं अहिंसावादी विचारों से पूरे विश्व की सोच बदलने वाले महात्मा गाँधी (Mahatma Gandhi) के जीवन का एक मात्र लक्ष्य था – आज़ादी एवं शांति की स्थापना । स्वतंत्रता और शांति के लिए गांधी जी द्वारा शुरू की गई इस लड़ाई ने भारत और दक्षिण अफ्रीका में कई ऐतिहासिक आंदोलनों को एक नई दिशा प्रदान की

Mahatma Gandhi

Mahatma Gandhi

नाम : मोहनदास करमचंद गांधी (Mohan Dass Karam Chand Gandhi)
पिता : करमचंद गाँधी
माता : पुतलीबाई
दादा : उत्तमचंद गांधी
जन्म : 2 अक्तुंबर 1869 पोरबंदर। (गुजरात)
पत्नी : कस्तूरबाई माखंजी कपाड़िया (कस्तूरबा)
संतान :
हरीलाल गाँधी (1888)
मणिलाल गाँधी (1892)
रामदास गाँधी (1897)
देवदास गाँधी (1900)
मृत्यु : 30 जनवरी, 1948, दिल्ली, भारत

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले मोहनदास करमचंद गाँधी जिन्हें पुरे विश्व में महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) के नाम से भी जाना जाता है इनका जन्म (जन्म 2 अक्टूबर, 1869, पोरबंदर, भारत – मृत्यु 30 जनवरी, 1948, दिल्ली, भारत) पश्चिम भारत (वर्तमान गुजरात) के एक तटीय शहर पोरबंदर में हुआ. इनके पिता का नाम करमचंद गाँधी (Karam Chand Gandhi) तथा माता का नाम पुतलीबाई था. महात्मा गांधी अपने पिता की चौथी पत्नी की सबसे छोटी संतान थे। उनके पिता ब्रिटिश भारत के अधीन पश्चिमी भारत में एक छोटी सी रियासत (जो अब गुजरात राज्य है) की राजधानी पोरबंदर के दीवान थे. गांधी जी का पालन-पोषण एक वैष्णव परिवार में हुआ था और इनकी माता अत्यधिक धार्मिक प्रवित्ति की महिला थीं. वह अहिंसा, शाकाहार, आत्मशुद्धि के लिए नियमित व्रत और परिवार की सेवा सुश्रुषा को अपना धर्म मानती थी. गाँधी जी का जीवन अपनी माता से बहुत प्रभावित था. दया, प्रेम, तथा ईश्वर के प्रति निस्वार्थ श्रद्धा के भाव उनमें बचपन में ही जागृत हो चुके थे और इन्ही मूल्यों के कारण आगे चलकर वे वकील, राजनीतिज्ञ, सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और अंग्रेजों के खिलाफ राष्ट्रवादी आंदोलन के नेता बने।

Mohan Dass Gandhi Young
Mohan Dass Karam Chand Gandhi

मोहनदास करमचंद गाँधी (Mohan Dass Karam Chand Gandhi) का विवाह सन 1883 में साढ़े तेरह साल की उम्र में अपने से 6 महीने बड़ी कस्तूरबा (कस्तूरबाई माखंजी कपाड़िया) से हुआ. उस समय कस्तूरबा की उम्र 14 वर्ष की थी. मोहनदास और कस्तूरबा के चार सन्ताने हुईं 1. हरीलाल गाँधी (1888), 2. मणिलाल गाँधी (1892), 3. रामदास गाँधी (1897) और 4. देवदास गाँधी (1900).

गांधी जी की प्रारम्भिक शिक्षा और मिडिल स्कूल तक की शिक्षा पोरबंदर में हुई थी। साल 1887 में राजकोट हाई स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा पास की और फिर भावनगर के शामलदास कॉलेज में प्रवेश प्राप्त किया, लेकिन ख़राब स्वास्थ्य और गृह वियोग के कारण कॉलेज छोड़कर वापिस पोरबंदर लौट गए। अपने 19वें जन्मदिन से लगभग एक महीने पहले ही 4 सितम्बर 1888 को कानून की पढाई करने और बैरिस्टर बनने के लिये वे इंगलैंड के लिए रवाना हो गये. शाकाहारी होने के कारण लन्दन में उन्हें भोजन से सम्बंधित बहुत कठिनाई हुई और शुरू के दिनों में कई बार भूखे ही रहना पड़ता था लेकिन फिर गाँधी जी ने लंदन वेजीटेरियन सोसायटी की सदस्यता ग्रहण कर ली. वे सोसाइटी के सम्मेलनों में भाग लेने लगे और पत्रिका में लेख भी लिखने लगे।

अपने इंगलैंड निवास के दौरान उनके एक थियोसिफिकल मित्र ने उन्हें एडविन अर्नोल्ड द्वारा श्रीमद भगवत गीता के अग्रेजी में अनुवाद की गई पुस्तक ‘दि सांग सेलेस्टियल` दी। उन्होंने पहली बार गीता का अध्ययन किया जिससे उनके युवा मन को बहुत बल मिला और धीरे-धीरे गीता उनके जीवन की सूत्रधार बन गई. इसके कुछ ही दिनों बाद उन्होंने बाइबल और बुद्ध की जीवनी का भी अध्ययन किया. इन सभी पुस्तकों ने उनके युवा मन पर अपनी एक अमिट छाप छोड़ी जिसका प्रभाव उनके चिंतन में स्पष्ट दिखाई देता है।

Mahatma-Gandhi
Mohan Dass Karam Chand Gandhi

इंगलैंड में 3 सालों (1888-1891) तक रहकर अपनी बैरिस्टरी की पढ़ाई पूरी करने के बाद गाँधी (Gandhi) जून 1891 में वापस भारत आ गए. भारत पहुँचने पर उन्होंने बॉम्बे में वकालत की शुरुआत की पर उन्हें कोई खास सफलता नहीं मिली। इस कारण वे वापिस राजकोट आ गये जहाँ उन्होंने जरूरतमन्दों के लिये वकालत का काम शुरू कर दिया. सन् 1893 में जब उनकी उम्र 24 वर्ष की थी वे एक गुजराती व्यापारी शेख अब्दुल्ला से एक वर्ष के करार पर वकालत का काम करने के लिए दक्षिण अफ्रीका चले गये.

अफ्रीका में महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा जिन्होंने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी. दक्षिण अफ्रीका में डरबन से प्रीटोरिया के लिए ट्रेन में सफ़र के दौरान घटी एक घटना ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया. उस सफ़र के दौरान गाँधी को फर्स्ट क्लास का टिकट होने के बावजूद एक अंग्रेज टिकट चेकर ने फर्स्ट क्लास से थर्ड क्लास डिब्बे में जाने के लिए कहा. उन्होंने अपना टिकट दिखा कर थर्ड क्लास डिब्बे में जाने से इनकार कर दिया लेकिन पीटरमारिट्जबर्ग स्टेशन पर गांधी को अंग्रेज रेलवे कर्मी ने धक्का देकर ट्रेन से नीचे उतार दिया. वह कड़ाके की ठंडी रात उन्होंने रेलवे स्टेशन के वेटिंग रूम में गुजारी. उस घटना ने गाँधी के मन में दक्षिण अफ्रीका में स्थानीय और भारतीय मूल के लोगों पर हो रहे अंग्रेजों के अत्याचार के विरुद्ध सत्याग्रह की नींव डाल दी थी. महात्मा गांधी पर यह नस्लभेद का पहला प्रहार था, जो उनके बर्दाश्त से बाहर था. उसी रात से वकील मोहनदास करमचंद गांधी के महात्मा गांधी बनने का सफर शुरू हो गया.

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गाँधी जी ने अंग्रेजों से भारत की स्वतंत्रता के लिए सत्याग्रह के सिद्धांतों का उपयोग करते हुए आन्दोलन की शुरुआत की, जिसे सत्याग्रह आन्दोलन के नाम से जाना जाता है । उनकी सोच थी कि उचित कारण के लिए जेल जाना सम्मानजनक है। गांधी जी को दक्षिण अफ्रीका और भारत में उनकी गतिविधियों के लिए अंग्रेजी सरकार द्वारा कई बार गिरफ्तार किया गया.

सन 1942 में गाँधीजी ने ‘भारत छोड़ो’ का नारा दिया जो भारत में ब्रिटिश शासन के अंत का संकेत था। 1947 में अंग्रेजों द्वारा भारत को स्वतंत्र कर दिया गया परन्तु इस दौरान देश को दो भागों भारत और पाकिस्तान में विभाजित कर दिया गया । गांधी एक अखंड भारत की वकालत करते थे जहां हिंदू और मुस्लिम शांति से रह सकते थे. परन्तु विभाजन ने हिंदुओं और मुसलमानों के बीच एक दरार पैदा कर दी जो कि एक बहुत बड़े कत्लेआम का कारण बनी. इस कत्लेआम के विरोध में 13 जनवरी, 1948 को, 78 वर्ष की आयु में, गाँधी जी ने रक्तपात को रोकने के उद्देश्य से उपवास शुरू किया। उपवास के पांच दिनों के बाद विपक्ष के नेताओं द्वारा झगड़ा ख़त्म करने की सहमती के बाद गांधी ने अपना अनशन तोड़ दिया.  इसके बारह दिन बाद जब गाँधी जी दिल्ली स्थित बिड़ला मंदिर से अपनी संध्या प्रार्थना समाप्त कर बाहर निकल रहे थे  उस समय एक कट्टरपंथी, नाथूराम गोडसे, जो गाँधी जी सभी पंथों और धर्मों के लिए सहिष्णुता के विचारों का विरोध करता था, उसके द्वारा गाँधी जी के सीने पर ताबड़तोड़ तीन गोलियाँ मार कर हत्या कर दी गई। मरते वक्त उन्होंने दो शब्द बोले – हे राम! उनका अंतिम संस्कार यमुना के तट पर किया गया।

गांधी जी के कुछ प्रसिद्ध विचार / सूक्तियां : Some famous thoughts of Gandhiji

अहिंसा सबसे बड़ा कर्तव्‍य है। यदि हम इसका पूरा पालन नहीं कर सकते हैं तो हमें इसकी भावना को अवश्‍य समझना चाहिए और जहां तक संभव हो हिंसा से दूर रहकर मानवता का पालन करना चाहिए।”

उस प्रकार जिएं कि आपको कल मर जाना है। सीखें उस प्रकार जैसे आपको सदा जीवित रहना हैं।”

आजादी का कोई अर्थ नहीं है यदि इसमें गलतियां करने की आजादी शामिल न हों।”

बेहतर है कि हिंसा की जाए, यदि यह हिंसा हमारे दिल में हैं, बजाए इसके कि नपुंसकता को ढकने के लिए अहिंसा का शोर मचाया जाए।”

व्‍यक्ति को अपनी बुद्धिमानी के बारे में पूरा भरोसा रखना बुद्धिमानी नहीं है। यह अच्‍छी बात है कि याद रखा जाए कि सबसे मजबूत भी कमजोर हो सकता है और बुद्धिमान भी गलती कर सकता है।”

आपको मानवता में विश्‍वास नहीं खोना चाहिए। मानवता एक समुद्र है, यदि समुद्र की कुछ बूंदें सूख जाती है तो समुद्र मैला नहीं होता।”

ईमानदार मतभेद आम तौर पर प्रगति के स्‍वस्‍थ संकेत हैं।”

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